लकड़ी जल डूबै नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।
अपनी सींची जानि के, यही बड़ने की रीति॥
लकड़ी जल में डूबती नहीं—यह कैसी प्रीति? जिसने उसे सींचा था उसी को पहचानकर वह ऊपर तैरती है; बड़प्पन की यही रीति है।
सत्संग और संगति