प्रीति कर सुख लेने को, सो सुख गया हिराय।
जैसे पाइ छछूंदरी, पकड़ि साँप पछिताय॥
सुख पाने के लिए प्रीति की, पर वह सुख ही खो गया। जैसे साँप छछूंदर पकड़कर पछताता है, वैसी ही दशा हो जाती है।
सत्संग और संगति
सुख पाने के लिए प्रीति की, पर वह सुख ही खो गया। जैसे साँप छछूंदर पकड़कर पछताता है, वैसी ही दशा हो जाती है।
सत्संग और संगति
हंसा मोती चुगत था, कुच्छ थार भराय।
जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय॥
हंस मोती चुगता है और थाल भरता जाता है। पर जो व्यक्ति मार्ग ही नहीं जानता, उससे कोई क्या करा सकता है? पात्रता के बिना अवसर भी व्यर्थ हो जाता है।
सत्संग और संगतिसोना, सज्जन, साधुजन, टूट जुड़ै सौ बार।
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एके धका दरार॥
सोना, सज्जन और साधु—ये सौ बार टूटकर भी फिर जुड़ जाते हैं। पर दुर्जन कुम्हार के कच्चे घड़े जैसा है, एक ही धक्के में दरक जाता है और फिर नहीं जुड़ता।
सत्संग और संगतिकबीर जात पुकारया, चढ़ चंदन की डार।
बाट लगाए ना लगे, फिर क्या लेत हमार॥
कबीर चंदन की डाल पर चढ़कर पुकार-पुकारकर मार्ग बताते रहे। जो फिर भी राह पर नहीं आया, उसका उपदेशक क्या ले लेगा? सुनना और अपनाना सुनने वाले पर निर्भर है।
सत्संग और संगतिहरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप।
निशिवासर सुख निधि, लहा अटल प्रगटा आप॥
हरि की संगति से मन शीतल हो गया और मोह का ताप मिट गया। दिन-रात सुख का भंडार मिल गया और भीतर अटल आत्मस्वरूप स्वयं प्रकट हो गया।
सत्संग और संगति