नीर पियावत क्या फिरै, सायर घर-घर बारि।
जो तृषावंत होइगा, सो पीवेगा झखमारि॥
पानी पिलाते क्यों फिरते हो, घर-घर में तो सागर भरा है। जो सचमुच प्यासा होगा, वह स्वयं ढूँढ़कर पी लेगा। ज्ञान थोपा नहीं जाता।
ज्ञान और विवेक