जो जन भीगे रामरस, बिगत कबहूँ ना रूख।
अनुभव भाव न दरसते, ना दुःख ना सुख॥
जो व्यक्ति राम-रस में भीग गया, वह कभी सूखता नहीं। उसका अनुभव बाहर से दिखाई नहीं देता; उस अवस्था में न दुःख रहता है, न सुख—वह दोनों से परे हो जाता है।
ज्ञान और विवेक