जहँ ग्राहक तहँ मैं नहीं, जहाँ मैं ग्राहक नाहिं।
मूरख यह भरमत फिरे, पकड़ शब्द की छाँय॥
जहाँ ग्राहक है वहाँ मैं नहीं पहुँचता, और जहाँ मैं हूँ वहाँ कोई ग्राहक नहीं। मूर्ख लोग शब्द की छाया भर पकड़कर भटकते फिरते हैं, तत्त्व तक नहीं पहुँचते।
ज्ञान और विवेक