कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढ़े बन माँहि।
ऐसे घट-घट राम है, दुनिया देखे नाहिं॥
कस्तूरी हिरन की अपनी ही नाभि में बसी है, पर वह उसे सारे वन में ढूँढ़ता फिरता है। इसी तरह राम हर हृदय में हैं, पर दुनिया उन्हें देख नहीं पाती।
ज्ञान और विवेक